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सात देशों के साहित्यकार जुटे, हिंदी साहित्य के बदलते स्वरूप पर हुई चर्चा

रायगढ़। हिंदी साहित्य का दायरा अब देश की सीमाओं से आगे बढ़ रहा है। प्रवासी लेखन, स्त्री-विमर्श, विभाजन की पीड़ा और बदलते सामाजिक सरोकारों जैसे विषयों ने इसके स्वरूप और अभिव्यक्ति को विस्तार दिया है। इन्हीं मुद्दों पर रायगढ़ में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें देश-विदेश के साहित्यकारों और शोधार्थियों ने विचार साझा किए।

शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, विश्व हिंदी अधिष्ठान न्यास, केंद्रीय हिंदी निदेशालय और बुल्गारिया के देवम फाउंडेशन के संयुक्त आयोजन में हुई संगोष्ठी शनिवार को संपन्न हुई। ‘इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य, विविध परिदृश्य’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ सात देशों के साहित्यकारों ने प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से भागीदारी की।

संगोष्ठी के दूसरे दिन साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि अरुण कमल ने छठे और सातवें तकनीकी सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने छायावाद के प्रणेता मुकुटधर पाण्डेय के साहित्यिक योगदान को याद किया। साथ ही विभिन्न वक्ताओं के विचारों और शोध प्रस्तुतियों की सराहना की।

दो दिनों तक चले इस आयोजन में हिंदी साहित्य के समकालीन स्वरूप, बदलते विषयों और वैश्विक स्तर पर उसकी बढ़ती पहुंच से जुड़े पहलुओं पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में देश-विदेश के साहित्यकारों और शोधार्थियों की भागीदारी ने हिंदी साहित्य के विविध परिदृश्यों को एक मंच पर प्रस्तुत किया।

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