रायगढ़। सरकारी आवासीय विद्यालय की जर्जर इमारत की मरम्मत के लिए अभिभावकों से 500-500 रुपए जमा कराने की अपील किए जाने का मामला सामने आया है। विद्यालय से जुड़े व्हाट्सऐप ग्रुप में भेजे गए एक संदेश का स्क्रीनशॉट सामने आने के बाद सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और रखरखाव की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। संदेश में स्कूल की जर्जर स्थिति का उल्लेख करते हुए अभिभावकों से आर्थिक सहयोग के साथ श्रमदान करने की भी अपील की गई है।
सामने आए व्हाट्सऐप संदेश में SMC उपाध्यक्ष की ओर से अभिभावकों को संबोधित किया गया है। संदेश के अनुसार, 27 अगस्त 2026 को विद्यालय में बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें स्कूल की जर्जर स्थिति पर चर्चा हुई। संदेश में दावा किया गया है कि बैठक में सभी पालकों द्वारा 500-500 रुपए जमा करने और विद्यालय की मरम्मत में सहयोग करने का निर्णय लिया गया।
संदेश में अभिभावकों से 30 अगस्त को शाम 4 बजे तक राशि जमा करने की बात कही गई है। इसके बाद सभी के साथ बैठक कर यह तय करने की बात लिखी गई है कि मरम्मत का काम कब और किस तरीके से शुरू किया जाएगा। इसमें आर्थिक सहयोग के अलावा दो दिन श्रमदान करने की अपील भी की गई है।
इस संदेश के सामने आने के बाद सवाल केवल 500 रुपए की राशि को लेकर नहीं, बल्कि सरकारी आवासीय विद्यालय की मरम्मत की जिम्मेदारी और इसके लिए उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी उठ रहे हैं। जिस विद्यालय में बच्चे सरकारी व्यवस्था के तहत शिक्षा के साथ आवासीय सुविधा प्राप्त कर रहे हैं, वहां भवन की मरम्मत के लिए अभिभावकों से राशि जुटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह सवाल अब चर्चा में है।
मामले में जिला खनिज न्यास निधि यानी DMF और औद्योगिक क्षेत्रों में उपलब्ध CSR संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों के लिए इन संसाधनों का उपयोग किए जाने की संभावनाओं का उल्लेख किया जा रहा है।
केंद्रीय खान मंत्रालय के अनुसार, संशोधित प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना यानी PMKKKY के दिशा-निर्देशों में शिक्षा को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। वर्ष 2024 के दिशा-निर्देशों के तहत DMF की कम से कम 70 प्रतिशत राशि उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में खर्च किए जाने का प्रावधान बताया गया है। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पर्यावरण तथा महिला एवं बाल कल्याण सहित अन्य क्षेत्र शामिल हैं।
ऐसे में यह सवाल भी सामने आया है कि यदि किसी सरकारी आवासीय विद्यालय की इमारत मरम्मत योग्य है, तो उसके लिए सरकारी बजट, DMF या उपलब्ध अन्य संस्थागत संसाधनों से व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है। हालांकि, संबंधित विद्यालय में मरम्मत के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रस्ताव भेजा गया है या नहीं, इसकी जानकारी उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट नहीं है।
मामले को लेकर पूर्व भाजपा नेता रवि भगत ने भी सवाल उठाए हैं। भगत लंबे समय से DMF की राशि को खनन प्रभावित क्षेत्रों की मूलभूत जरूरतों पर खर्च किए जाने की मांग उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि जब DMF के माध्यम से शिक्षा सहित बुनियादी सुविधाओं के लिए राशि खर्च की जा सकती है, तब सरकारी आवासीय विद्यालय की मरम्मत के लिए अभिभावकों से 500-500 रुपए लेना व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
रवि भगत ने अपने राजनीतिक सफर को भी DMF के मुद्दे से जोड़ते हुए कहा है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में DMF राशि के उचित आवंटन और उपयोग का मुद्दा उठाने को लेकर पार्टी के बड़े नेताओं से उनके मतभेद बढ़े और अंततः उन्होंने भाजपा छोड़ दी। यह उनका स्वयं का राजनीतिक दावा है।
केंद्रीय खान मंत्रालय के फरवरी 2024 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में DMF के तहत कुल 12,396.51 करोड़ रुपए की राशि एकत्र हुई थी। वहीं 13,489.66 करोड़ रुपए की राशि आवंटित और 9,440.62 करोड़ रुपए खर्च होने की जानकारी दी गई थी। यह पूरे छत्तीसगढ़ के सभी जिलों का समेकित आंकड़ा है। इसलिए संबंधित जिले में वर्तमान में DMF के तहत कितनी राशि उपलब्ध है और शिक्षा के लिए कितनी राशि स्वीकृत या खर्च की गई है, यह अलग से जांच का विषय है।
रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में CSR के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्य भी किए जाते रहे हैं। केंद्रीय खान मंत्रालय के दस्तावेजों में रायगढ़ के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के लिए CSR के तहत चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियों का भी उल्लेख मिलता है।
इसी आधार पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या औद्योगिक संस्थानों के CSR के माध्यम से सरकारी आवासीय विद्यालय की मरम्मत जैसे कार्यों के लिए सहयोग लिया जा सकता है। यदि इसके लिए कोई प्रस्ताव भेजा गया है तो उसकी स्थिति क्या है और यदि प्रस्ताव नहीं भेजा गया तो इसकी वजह क्या है, यह भी स्पष्ट होना बाकी है।
वहीं, अभिभावकों से मांगी जा रही 500 रुपए की राशि को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उपलब्ध व्हाट्सऐप संदेश से यह साफ नहीं होता कि राशि स्वैच्छिक सहयोग के रूप में मांगी गई है, SMC का औपचारिक निर्णय है या इसे किसी विभागीय अनुमति के तहत लिया जा रहा है। इसी तरह दो दिन श्रमदान की अपील को लेकर भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह पूरी तरह स्वैच्छिक है या अभिभावकों से अपेक्षा की जा रही है।
मामले में शिक्षा विभाग का पक्ष जानने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ। इसके चलते फिलहाल विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ सका है। विद्यालय प्रबंधन या शिक्षा विभाग की ओर से स्पष्टीकरण मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मरम्मत के लिए अभिभावकों से राशि जुटाने की प्रक्रिया किस आधार पर शुरू की गई और विद्यालय भवन की मरम्मत के लिए सरकारी स्तर पर क्या व्यवस्था प्रस्तावित है।

